भारत में कुपोषण की स्थिति का विश्लेषण करें तो आंकड़े वाकई चौंकाने वाले हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 5 साल से कम उम्र के 35.5% बच्चे स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) का शिकार हैं। सरल शब्दों में कहें तो, हर तीन में से एक बच्चा अपनी उम्र के मुकाबले शारीरिक रूप से पिछड़ गया है। इसके अलावा, 19.3% बच्चे वेस्टिंग (लंबाई के हिसाब से कम वजन) से पीड़ित हैं, जो ‘गंभीर तीव्र कुपोषण’ की ओर इशारा करता है.
महिलाओं की स्थिति तो और भी चिंताजनक है—15 से 49 वर्ष की 57% महिलाएँ एनीमिया (खून की कमी) से ग्रस्त हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा मात्र 26% है। यह अंतर साफ बताता है कि हमारी बेटियों और माताओं तक पोषण का सही लाभ नहीं पहुँच पा रहा है.
इन्हीं चुनौतियों से निपटने और इन आंकड़ों को सुधारने के लिए सरकार ने एक व्यापक रणनीति तैयार की है। यदि आप समझना चाहते हैं कि इन समस्याओं का समाधान सरकार कैसे कर रही है, तो आप पोषण अभियान का विस्तृत विश्लेषण (2026) यहाँ पढ़ सकते हैं, जिसमें इस संकट से उबरने के सरकारी प्रयासों की पूरी जानकारी दी गई है.
Who is Most Affected
ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की तुलना में कुपोषण अधिक है, लेकिन शहरी झुग्गियों में भी यह समस्या विकराल है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों में बच्चों के कुपोषण के आँकड़े राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में स्थिति सबसे गंभीर है।
रूढ़िवादी सोच और लैंगिक भेदभाव भी कुपोषण को बढ़ावा देते हैं। कई घरों में महिलाएँ आखिरी में और सबसे कम खाती हैं। NFHS-5 के मुताबिक, 49 प्रतिशत महिलाओं को अपनी कमाई पर खुद फैसला लेने का अधिकार नहीं है। जब महिला आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होती, तो परिवार का पोषण भी प्रभावित होता है।
Why Should We Care
कुपोषण सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है – यह देश की भविष्य की ताकत को कमजोर करती है। एक कुपोषित बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से पीछे रह जाता है, उसकी पढ़ने-लिखने की क्षमता कम होती है, और वह बड़ा होकर कम उत्पादक बन पाता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में कहा था: “बच्चे सिर्फ लाभार्थी नहीं हैं, वे राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के वास्तुकार हैं।” यदि हम आज कुपोषण को नहीं रोकते, तो कल हमारा मानव संसाधन कमजोर होगा।
What is Poshan Abhiyaan
When and Why It Started
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 मार्च 2018 (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) को झुंझुनू, राजस्थान से पोषण अभियान (राष्ट्रीय पोषण मिशन) की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य था – बच्चों, किशोरियों और गर्भवती-स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण को समाप्त करना। लक्ष्य रखा गया कि स्टंटिंग, अंडरन्यूट्रिशन और एनीमिया में सालाना 2-3 प्रतिशत की कमी लाई जाए।
Main Parts of the Scheme
पोषण अभियान तीन स्तंभों पर टिका है:
- अभिसरण (Convergence): 20 से अधिक मंत्रालयों (स्वास्थ्य, जल शक्ति, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा, पंचायती राज आदि) को एक साथ लाकर कुपोषण के विभिन्न कारणों पर एक साथ काम करना।
- प्रौद्योगिकी (Technology): पोषण ट्रैकर ऐप के ज़रिए वास्तविक समय में लाभार्थियों की निगरानी, सेवा वितरण और विकास मापन।
- जन आंदोलन (Jan Andolan): हर साल सितंबर में राष्ट्रीय पोषण माह और मार्च-अप्रैल में पोषण पखवाड़ा मनाकर समुदाय को जागरूक किया जाता है।
“पोषण के पाँच सूत्र” भी इस अभियान की रीढ़ हैं: पहले 1000 दिन, दस्त पर नियंत्रण, स्थानीय पौष्टिक आहार, स्वच्छता और एनीमिया की रोकथाम।
How It Uses Technology
पोषण ट्रैकर ऐप ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को डिजिटल रूप से जोड़ा। इससे बच्चों का वजन, ऊँचाई और टीकाकरण का डेटा रियल-टाइम में अपलोड होता है। जून 2025 से फेस रिकग्निशन सिस्टम (FRS) मॉड्यूल अनिवार्य कर दिया गया, ताकि लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित की जा सके और डुप्लीकेसी रोकी जा सके। अब तक देशभर में 10 करोड़ से अधिक लाभार्थी इस ट्रैकर पर दर्ज हैं।
How Well is Poshan Abhiyaan Working
What the Data Shows
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पोषण अभियान के शुरू होने के बाद कुछ राज्यों में सुधार देखा गया है। उदाहरण के लिए, ओडिशा ने पोषण ट्रैकर के जरिए गंभीर कुपोषण (SAM) वाले बच्चों की पहचान कर उनका इलाज शुरू किया, जिससे एक साल में SAM में 12 प्रतिशत की गिरावट आई।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सुधार धीमा है। अभी भी 35.5 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग के शिकार हैं – यानी लक्ष्य से काफी दूर हैं। क्या हम सच में हर साल 2-3 प्रतिशत कमी ला पा रहे हैं?
The Money Problem
अभियान के लिए धन की कमी नहीं है, बल्कि धन का सही उपयोग न होना बड़ी समस्या है। वित्त वर्ष 2025-26 में सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के लिए ₹21,960 करोड़ का बजट रखा गया था। लेकिन पिछले वर्षों की कैग ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर 2022 तक केवल 69 प्रतिशत धन ही खर्च हो पाया था।
पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तो धन का उपयोग लगभग शून्य रहा। जब पैसा समय पर नीचे तक नहीं पहुँचता, तो आंगनवाड़ी केंद्रों में पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, प्रशिक्षण नहीं हो पाता, और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है।
Success Stories from the Ground
हालाँकि कई राज्यों में संघर्ष जारी है, फिर भी कुछ सफलता की कहानियाँ हैं:
- केरल: आंगनवाड़ी केंद्रों में पोषण वाटिका (किचन गार्डन) बनाकर ताज़ी सब्जियाँ उपलब्ध कराई गईं।
- तमिलनाडु: पोषण ट्रैकर के साथ सामुदायिक निगरानी (सोशल ऑडिट) की प्रणाली लागू की, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ी।
- मध्य प्रदेश: C-SAM (सामुदायिक आधारित गंभीर कुपोषण प्रबंधन) कार्यक्रम से 44.8 प्रतिशत बच्चों का ठीक होना दर्ज किया गया। हालाँकि यह आँकड़ा अपेक्षित स्तर से कम है, लेकिन यह दर्शाता है कि सही प्रोटोकॉल से परिणाम आ सकते हैं।
Hidden Problems That No One Talks About
The Anganwadi Worker Crisis
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पोषण अभियान की रीढ़ हैं, लेकिन उनकी स्थिति दयनीय है। वे कुपोषण की रोकथाम से लेकर टीकाकरण, प्री-स्कूल शिक्षा और अब डिजिटल डेटा एंट्री तक – सब कुछ संभालती हैं। मानदेय महज कुछ हज़ार रुपये है, जबकि काम का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
पंजाब में 28,515 स्मार्टफोन छह साल से नहीं खरीदे जा सके, हालाँकि केंद्र सरकार ने ₹27 करोड़ जारी किए थे। अब FRS मॉड्यूल अनिवार्य होने के कारण बिना स्मार्टफोन वाले राज्यों में लगभग 12 लाख लाभार्थी पोषण से वंचित हो सकते हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को सिर्फ मोबाइल चलाना नहीं, बल्कि 5G नेटवर्क की सुविधा भी चाहिए। आधे ग्रामीण इलाकों में 5G कनेक्टिविटी नहीं है – तो डिजिटल ट्रैकिंग कैसे होगी?
Where is the Women’s Voice
पोषण अभियान में महिलाओं को सिर्फ “लाभार्थी” के रूप में देखा जाता है, न कि “बदलाव लाने वाली” के रूप में। जबकि शोध साबित करते हैं कि आर्थिक रूप से सशक्त महिलाएँ अपने बच्चों के पोषण पर बेहतर ध्यान देती हैं।
पोषण अभियान की योजनाओं में महिला स्वयं सहायता समूहों (SHG) को सक्रिय रूप से जोड़ने की संभावना अब तक अनदेखी रही है। यदि महिलाएँ स्वयं पौष्टिक आहार उगाने, बेचने और जागरूकता फैलाने में जुटें, तो कुपोषण पर तेज़ प्रहार हो सकता है।
Cities Are Being Forgotten
जब हम कुपोषण की बात करते हैं, तो दिमाग में गाँव आते हैं। लेकिन शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लाखों परिवार भी गंभीर कुपोषण का सामना करते हैं। यहाँ प्रवासी मजदूर, अनियमित आय, अस्थिर रहन-सहन और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच की कमी बड़ी बाधाएँ हैं।
पोषण अभियान की वर्तमान रणनीति शहरी क्षेत्रों के लिए कोई विशेष दिशा-निर्देश नहीं देती। जबकि शहरी स्वास्थ्य केंद्र और आंगनवाड़ी शहरी मिशन के तहत भी काम करते हैं, उनमें समन्वय नहीं है।
Good Food is More Than a Packet
आज तक पोषण अभियान की चर्चा अक्सर सप्लीमेंट्री न्यूट्रिशन (थाली, पोषाहार) के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन असली समस्या आहार विविधता की कमी है। एक बच्चे को सिर्फ दाल-चावल नहीं, बल्कि हरी सब्जियाँ, फल, अंडा, दूध और स्थानीय अनाज (मोटा अनाज, श्री अन्न) चाहिए।
मोटे अनाज (मिलेट्स) को बढ़ावा देकर हम पोषण और जलवायु दोनों मोर्चों पर फायदा कर सकते हैं। लेकिन आंगनवाड़ी वितरण प्रणाली में अभी भी यह प्राथमिकता नहीं है।
What Must Change Now
Fix the Frontline First
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाया जाना चाहिए, उनके लिए नियमित प्रशिक्षण और करियर ग्रोथ का रास्ता बनाया जाना चाहिए। स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्टिविटी को मूलभूत सुविधा बनाया जाए, न कि बोझ।
राज्य सरकारों को केंद्रीय धन का उपयोग समय पर करना सुनिश्चित करना चाहिए। यदि धन का 30-40 प्रतिशत ही खर्च होता है, तो कुपोषण पर काबू पाना असंभव है।
Make Convergence Real
कागज़ों पर अभिसरण तो है, लेकिन ज़मीन पर विभाग अलग-अलग काम करते हैं। जिला स्तर पर संयुक्त बजट और संयुक्त कार्य योजना बनाई जाए। उदाहरण के लिए, जल जीवन मिशन के तहत हर घर में नल का पानी पहुँच रहा है, लेकिन इसका दस्त नियंत्रण और कुपोषण से सीधा संबंध नहीं जोड़ा जा रहा।
Put Women at the Center
महिला सशक्तिकरण को पोषण अभियान का केंद्र बनाया जाए। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) के लाभ को सरल बनाया जाए ताकि गर्भवती माताओं को समय पर राशि मिले। स्वयं सहायता समूहों को पोषण वाटिका, मिलेट्स प्रोसेसिंग और जागरूकता अभियानों से जोड़ा जाए।
Use Local Food, Not Just Handouts
हर राज्य, हर जिला अपने स्थानीय पौष्टिक आहार को पहचाने और आंगनवाड़ी मेनू में शामिल करे। मोटे अनाज, अंडा, सोयाबीन, हरी सब्जियाँ – जो स्थानीय रूप से उपलब्ध हो, उसे प्राथमिकता दी जाए। इससे न सिर्फ पोषण बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
Frequently Asked Questions
पोषण अभियान और मिशन पोषण 2.0 में क्या अंतर है?
पोषण अभियान 2018 में शुरू हुआ था। मिशन पोषण 2.0 इसे 2021 में अपडेट किया गया स्वरूप है, जिसमें सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण ट्रैकर को जोड़ा गया और किशोरियों को भी शामिल किया गया।
पोषण ट्रैकर ऐप कैसे काम करता है?
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हर बच्चे का वजन, ऊँचाई और टीकाकरण डेटा इस ऐप पर डालती हैं। इससे सरकार को रियल-टाइम जानकारी मिलती है और जरूरतमंद बच्चों की पहचान जल्दी हो जाती है।
कुपोषण के मुख्य कारण क्या हैं?
अपर्याप्त भोजन, आहार विविधता की कमी, बार-बार होने वाली बीमारियाँ (जैसे दस्त), खराब स्वच्छता, महिलाओं की निम्न स्थिति और प्रारंभिक बचपन में उचित देखभाल का अभाव।
क्या पोषण अभियान सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित है?
नहीं, यह पूरे देश में लागू है। लेकिन शहरी क्षेत्रों, विशेषकर झुग्गी-झोपड़ियों में इसका प्रभाव कम दिखता है।
कुपोषण को दूर करने में आम नागरिक कैसे मदद कर सकता है?
अपने आस-पास के आंगनवाड़ी केंद्र की नियमित निगरानी करें, पोषण वाटिका लगाने में सहयोग दें, और महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने वाली योजनाओं को प्रोत्साहित करें।
क्या कुपोषित बच्चे को सिर्फ सरकारी सप्लीमेंट से ठीक किया जा सकता है?
नहीं, सप्लीमेंट के साथ-साथ घर में पौष्टिक आहार, स्वच्छता, और नियमित स्वास्थ्य जाँच जरूरी है।
गंभीर कुपोषण (SAM) वाले बच्चों के लिए क्या सुविधा है?
सी-सैम (C-SAM) कार्यक्रम के तहत ऐसे बच्चों को आंगनवाड़ी या नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर विशेष पोषण पुनर्वास दिया जाता है।
सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य कौन से हैं?
केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और ओडिशा ने पोषण अभियान के विभिन्न पहलुओं में बेहतर परिणाम दिखाए हैं।
पोषण अभियान के लिए बजट कितना है और यह पर्याप्त है?
2025-26 में ₹21,960 करोड़ का प्रावधान है। विशेषज्ञों के अनुसार आवश्यकता लगभग ₹48,440 करोड़ सालाना है, इसलिए मौजूदा बजट अपर्याप्त है।
क्या आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कमी पूरी की जा रही है?
अभी भी कई राज्यों में रिक्तियाँ हैं। कार्यकर्ताओं का मनोबल और मानदेय बढ़ाने की आवश्यकता है।
Key Data Table
| सूचक | आँकड़ा (NFHS-5 / अन्य) |
|---|---|
| बच्चों में स्टंटिंग | 35.5% |
| बच्चों में वेस्टिंग | 19.3% |
| महिलाओं में एनीमिया | 57% |
| पोषण 2.0 बजट (2025-26) | ₹21,960 करोड़ |
| आवश्यक वार्षिक निवेश (अनुमान) | ₹48,440 करोड़ |
| धन उपयोग (दिसंबर 2022) | 69% |
Conclusion
पोषण अभियान एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसमें कुपोषण को जड़ से मिटाने की क्षमता है। लेकिन कागजों में लिखी बातें तब तक अधूरी हैं, जब तक जमीनी हकीकत न बदले। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को सशक्त बनाए बिना, महिलाओं को निर्णय की शक्ति दिए बिना, और शहरी-ग्रामीण भेदभाव मिटाए बिना हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते।
प्रश्न यह है – क्या हम सिर्फ योजनाएँ बनाने में उलझे रहेंगे, या जवाबदेही तय करेंगे? क्या हम आँकड़ों की रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर हर बच्चे के वास्तविक विकास को सुनिश्चित करेंगे? उत्तर हम सभी को मिलकर देना है।
2 thoughts on “India’s Malnutrition Crisis: Poshan Abhiyaan Reality Check”